छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में स्थित मल्हार राज्य के महत्वपूर्ण प्राचीन और पुरातात्विक स्थलों में से एक है। यह स्थान अपने पुराने मंदिरों, देवी-देवताओं की प्राचीन मूर्तियों, मंदिरों के अवशेष और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। मल्हार (Malhar) बिलासपुर (छत्तीसगढ़) में स्थित एक प्रमुख प्राचीन पुरातात्विक स्थल है।
यहाँ ईसा पूर्व 1000 (मौर्य काल) से कलचुरी काल तक की प्राचीन सभ्यताओं के अवशेष मिले हैं। खोजें उत्खनन में प्राचीन मिट्टी का किला, स्थानीय सिक्के और सातवाहन कालीन मुद्राएँ मिली हैं। मंदिर भूमिगत गोमुखी शिवलिंग वाला पातालेश्वर मंदिर, डिंडेश्वरी देवी मंदिर और ऐतिहासिक देउर मंदिर मुख्य आकर्षण हैं।
यह स्थल सनातन, बौद्ध और जैन धर्मों का प्रमुख ऐतिहासिक केंद्र रहा है।
मल्हार को देखने पर छत्तीसगढ़ के प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास की झलक मिलती है। इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखने वाले पर्यटकों के लिए यह एक खास जगह है।
मल्हार के प्राचीन मंदिर : इतिहास, धार्मिक महत्व और घूमने की पूरी जानकारी
बिलासपुर, छत्तीसगढ़ में मल्हार पुरातात्विक स्थल की सैर
मल्हार पुरातात्विक स्थल बिलासपुर जिले का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और धार्मिक पर्यटन स्थल है। यहां प्राचीन मंदिरों, मूर्तियों, शिलालेखों, सिक्कों और पुरानी बस्तियों के अवशेषों के माध्यम से छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास को करीब से समझा जा सकता है। जिला प्रशासन भी मल्हार को ऐतिहासिक और धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में सूचीबद्ध करता है।
मल्हार का ऐतिहासिक महत्व
मल्हार का इतिहास बहुत पुराना माना जाता है। पुरातात्विक खुदाई से यहां पाषाण युग से लेकर मध्यकाल तक के जीवन और संस्कृति के प्रमाण मिले हैं। यहां विभिन्न कालखंडों से संबंधित मंदिरों, मूर्तियों और अन्य अवशेषों के प्रमाण मिले हैं।
यहां मिले पुरावशेषों से दक्षिण कोसल क्षेत्र के राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विकास की जानकारी मिलती है। यहां प्राप्त सामग्री से पता चलता है कि मल्हार प्राचीन समय में एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र रहा होगा।
मल्हार में मौर्य, शुंग, कुषाण, सातवाहन और गुप्तकाल के बाद के विभिन्न कालखंडों से जुड़ी पुरातात्विक सामग्री मिलने की जानकारी मिलती है। यहां से प्राप्त प्राचीन मूर्तियां और स्थापत्य अवशेष छत्तीसगढ़ की पुरानी कला और संस्कृति को समझने में महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
मल्हार में सातवाहन, शरभपुरीय, सोमवंशी और कलचुरी जैसे विभिन्न राजवंशों के प्रभाव के प्रमाण मिलते हैं। यहां शैव, वैष्णव, जैन और बौद्ध परंपराओं से जुड़े अवशेष भी मिले हैं, जिससे पता चलता है कि यह क्षेत्र धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण था।
प्राचीन दक्षिण कोसल के गौरवशाली इतिहास
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में स्थित मल्हार (Malhar) एक बेहद महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है, जिसके उत्खनन (खुदाई) से प्राचीन दक्षिण कोसल के गौरवशाली इतिहास और वहाँ राज करने वाले कई प्रमुख राजवंशों के अतीत पर गहरा प्रकाश पड़ा है।
अर्पा, लीलागर और शिवनाथ नदियों से घिरा यह प्राचीन नगर ताम्रपाषाण काल और मौर्य काल से लेकर मध्यकाल (कलचुरी काल) तक का एक जीवंत इतिहास समेटे हुए है।
मल्हार की खुदाई से मिले दक्षिण कोसल के 5 प्रमुख राजवंशों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है
मलहार में खुदाई से दक्षिण कोसल के कई राज्यों का अतीत का इतिहास मिला
- काल 1 – प्रागैतिहासिक काल (लगभग 1000 ईसा पूर्व से 350 ईसा पूर्व)
- काल 2 – मौर्य , शुंग , सातवाहन (लगभग 350 ईसा पूर्व से 300 ई.पू.)
- अवधि 3 – शरभपुरिया और सोमववंशी (लगभग 300 से 650 ई.पू.)
- काल 4 – उत्तर सोमवंशी (लगभग 650 से 900 ईस्वी)
- काल 5 – कलचुरी (लगभग 900 से 1300 ई.)
मौर्य काल : यहाँ मिट्टी का प्राचीन किला (परकोट) और ब्राह्मी लिपि वाली भारत की सबसे पुरानी चतुर्भुजी विष्णु प्रतिमा मिली है। जिस पर मौर्यकालीन ब्राह्मी लिपि में लेख खुदा हुआ है (लगभग 200 ईसा पूर्व)।
सातवाहन वंश : इस काल के सिक्के और सीलिंग (मुद्राएं) मिले हैं, जो मल्हार के एक बड़े व्यापारिक केंद्र होने की पुष्टि करते हैं।
गुप्त व वाकाटक काल : उन्नत नगर नियोजन (ड्रेनेज सिस्टम) और रोमन सिक्के मिले हैं, जो इस क्षेत्र का वैश्विक व्यापार दर्शाते हैं। इतिहासकार 325 से 655 ईस्वी के इस काल को दक्षिण कोसल के इतिहास का स्वर्ण युग मानते हैं, जब धर्म, कला और वास्तुकला अपने चरम पर पहुंची
शरभपूरीय व पांडुवंश : यहाँ से दुर्लभ ताम्रपत्र और शिलालेख मिले हैं, जो प्राचीन शासन व्यवस्था और बौद्ध-जैन संस्कृति के प्रमाण हैं।
कलचुरी वंश : 12वीं शताब्दी के कलचुरी शिलालेखों मल्हार को ‘मल्लाला पट्टाना’ (समृद्ध व्यापारिक नगर) कहा गया। इस काल के पातालेश्वर और डिंडेश्वरी मंदिर यहाँ की कला के प्रतीक हैं।
मंदिर स्थापत्य: इस काल में शैव और शाक्त मत का भारी प्रभाव रहा। यहाँ के प्रसिद्ध पातालेश्वर मंदिर (गोमुखी शिवलिंग), डिंडेश्वरी देवी मंदिर और देऊर मंदिर कलचुरी कालीन मूर्तिकला और वैभव के सबसे बड़े प्रतीक हैं।
पुरातत्व संग्रहालय: राज्य विभाग द्वारा स्थानीय संग्रहालय में खुदाई से प्राप्त दुर्लभ मूर्तियों, सिक्कों, मिट्टी के बर्तनों और प्राचीन शिलालेखों का एक समृद्ध संग्रह है
मल्हार के प्रमुख प्राचीन मंदिर
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में स्थित मल्हार केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि प्राचीन इतिहास और पुरातत्व की दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण स्थान है। यहां कई प्राचीन मंदिरों के अवशेष मौजूद हैं, जो छत्तीसगढ़ की स्थापत्य कला, मूर्तिकला और धार्मिक परंपराओं की समृद्ध विरासत को दर्शाते हैं।
पुरातात्विक खुदाई से मल्हार में अलग-अलग कालखंडों के मंदिर, मूर्तियां, शिलालेख और अन्य अवशेष प्राप्त हुए हैं। यही कारण है कि मल्हार को इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखने वाले लोगों के लिए खास स्थान माना जाता है।
1. माँ डिंडेश्वरी मंदिर
माँ डिंडेश्वरी मंदिर मल्हार का प्रमुख धार्मिक स्थल है। यह मंदिर देवी उपासना से जुड़ा हुआ है और स्थानीय लोगों के लिए विशेष आस्था का केंद्र है। मंदिर परिसर मल्हार के प्राचीन पुरातात्विक क्षेत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

मंदिर और इसके आसपास प्राचीन मूर्तिकला के अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं। यहां की स्थापत्य शैली और मूर्तियां मल्हार के प्राचीन धार्मिक वातावरण की झलक देती हैं। मल्हार में शैव, वैष्णव और अन्य धार्मिक परंपराओं के प्रमाण मिलने से यह स्पष्ट होता है कि यह क्षेत्र लंबे समय तक धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रहा।
माँ डिंडेश्वरी मंदिर में धार्मिक दर्शन के साथ-साथ पर्यटक आसपास के प्राचीन अवशेषों को भी देख सकते हैं। मंदिर की यात्रा उन लोगों के लिए विशेष रूप से रोचक हो सकती है, जिन्हें प्राचीन मंदिर, धार्मिक इतिहास और छत्तीसगढ़ की संस्कृति को करीब से जानने में रुचि है।
मल्हार का डिडनेश्वरी मंदिर भी यहां का प्रमुख आकर्षण है। यह देवी डिडनेश्वरी को समर्पित मंदिर है और स्थानीय धार्मिक परंपरा में इसका विशेष स्थान है।
मंदिर में देवी की प्रतिमा के दर्शन के लिए आसपास के क्षेत्रों से श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर की प्राचीनता और आसपास मौजूद पुरातात्विक वातावरण इसे सामान्य धार्मिक स्थलों से अलग बनाता है।
2. पातालेश्वर महादेव मंदिर
मल्हार का पातालेश्वर महादेव मंदिर यहां के सबसे महत्वपूर्ण प्राचीन मंदिरों में से एक है। यह भगवान शिव को समर्पित मंदिर है और इसकी स्थापत्य शैली मध्यकालीन छत्तीसगढ़ की कला को दर्शाती है। मंदिर को पुराने समय में केदारेश्वर मंदिर के नाम से भी जाना जाता था।
इस मंदिर की सबसे खास विशेषता इसका गर्भगृह है, जो सामान्य मंदिरों की तुलना में कुछ नीचे स्तर पर स्थित है। इसी वजह से इसे पातालेश्वर नाम से जाना जाता है। मंदिर की संरचना में पत्थर की नक्काशी और प्राचीन स्थापत्य के कई महत्वपूर्ण तत्व दिखाई देते हैं।
छत्तीसगढ़ संस्कृति विभाग के अनुसार मंदिर से संबंधित 1167–68 ईस्वी का एक अभिलेख प्राप्त हुआ है। इस अभिलेख से मंदिर और उस समय की धार्मिक गतिविधियों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है।
आज मंदिर श्रद्धालुओं के साथ-साथ इतिहास और वास्तुकला में रुचि रखने वाले पर्यटकों को भी आकर्षित करता है। मल्हार की यात्रा में पातालेश्वर महादेव मंदिर को सबसे पहले देखने योग्य स्थानों में शामिल किया जा सकता है।
3. देउर मंदिर
मल्हार का देउर मंदिर यहां की प्राचीन मूर्तिकला और मंदिर स्थापत्य का महत्वपूर्ण उदाहरण है। मंदिर परिसर से प्राप्त मूर्तियां उस समय की धार्मिक मान्यताओं और कलाकारों की उत्कृष्ट शिल्पकला को दर्शाती हैं।
मंदिर के स्थापत्य में देवी-देवताओं और अन्य धार्मिक आकृतियों की सुंदर नक्काशी देखने को मिलती है। यहां गंगा और यमुना जैसी नदी देवियों से संबंधित मूर्तिकला भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसके अलावा अर्धनारीश्वर जैसी प्रतिमाएं भी मल्हार की धार्मिक विविधता और प्राचीन कला की जानकारी देती हैं।
आज मंदिर का पूरा मूल स्वरूप सुरक्षित नहीं है, लेकिन बचे हुए अवशेष इसकी ऐतिहासिक महत्ता को समझने के लिए काफी हैं। पुराने पत्थरों पर की गई नक्काशी को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि अपने समय में यहां की मंदिर कला कितनी विकसित रही होगी।
पुरातत्व और प्राचीन भारतीय वास्तुकला में रुचि रखने वाले यात्रियों के लिए देउर मंदिर मल्हार के प्रमुख आकर्षणों में से एक है।
प्राचीन मंदिरों के अवशेष और मूर्तिकला
मल्हार की खासियत केवल एक-दो मंदिरों तक सीमित नहीं है। पूरे पुरातात्विक क्षेत्र में प्राचीन मंदिरों के अवशेष, देवी-देवताओं की मूर्तियां, शिलालेख और स्थापत्य के विभिन्न हिस्से देखने को मिलते हैं। इन अवशेषों से पता चलता है कि प्राचीन समय में मल्हार एक विकसित धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र रहा होगा।
मल्हार से प्राप्त चतुर्भुजी विष्णु की प्राचीन प्रतिमा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। जिला प्रशासन के अनुसार इस प्रतिमा पर ब्राह्मी लिपि में प्राकृत भाषा का लेख मिलता है और इसे लगभग 200 ईसा पूर्व का माना जाता है। यह खोज मल्हार के प्राचीन वैष्णव इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण मानी जाती है।
इसके अलावा यहां मिले विभिन्न कालों के पुरावशेष यह बताते हैं कि मल्हार में धार्मिक गतिविधियां लंबे समय तक चलती रहीं। मंदिरों की मूर्तियों में देवी-देवताओं के साथ-साथ विभिन्न सजावटी आकृतियों का प्रयोग भी दिखाई देता है।
मल्हार के मंदिर क्यों खास हैं?
मल्हार के मंदिरों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां धर्म, इतिहास, पुरातत्व और कला एक साथ देखने को मिलते हैं। यहां के मंदिर केवल पूजा के स्थान नहीं हैं, बल्कि वे प्राचीन छत्तीसगढ़ की संस्कृति और स्थापत्य परंपरा के महत्वपूर्ण प्रमाण भी हैं।
मंदिरों के आसपास मौजूद पुरावशेषों से यह समझने में मदद मिलती है कि सदियों पहले इस क्षेत्र में किस प्रकार की धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियां होती थीं। अलग-अलग कालखंडों से मिले अवशेष मल्हार के लंबे इतिहास को सामने लाते हैं।
अगर आप बिलासपुर या आसपास के क्षेत्र में घूमने का प्लान बना रहे हैं और आपको इतिहास, प्राचीन मंदिर, मूर्तिकला और पुरातत्व में रुचि है, तो मल्हार को अपनी यात्रा में जरूर शामिल करना चाहिए। यहां पातालेश्वर महादेव मंदिर, माँ डिंडेश्वरी मंदिर, देउर मंदिर और आसपास के प्राचीन अवशेष मिलकर मल्हार को छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पर्यटन स्थलों में शामिल करते हैं।
मल्हार क्यों घूमना चाहिए ?
अगर आपको इतिहास, प्राचीन मंदिर और पुरातत्व में रुचि है, तो मल्हार आपके लिए एक अच्छा पर्यटन स्थल हो सकता है। यहां आपको आधुनिक पर्यटन स्थलों की भीड़ की बजाय प्राचीन इतिहास और धार्मिक वातावरण देखने को मिलता है।
बिलासपुर और आसपास के क्षेत्रों से मल्हार की यात्रा आसानी से की जा सकती है। आप यहां मंदिरों के दर्शन के साथ-साथ प्राचीन अवशेषों और मूर्तियों को भी देख सकते हैं।
मल्हार की प्राचीन मूर्तियां और पुरातात्विक अवशेष
मल्हार की सबसे बड़ी खासियत यहां मिलने वाली प्राचीन मूर्तियां और पुरातात्विक अवशेष हैं। यहां पत्थर से बनी देवी-देवताओं की मूर्तियां, मंदिरों के हिस्से और पुराने स्थापत्य के अवशेष देखने को मिलते हैं। मल्हार का प्राचीन किला और पुरावशेष मल्हार में प्राचीन बस्ती और किले के अवशेष भी मिलते हैं।
छत्तीसगढ़ संस्कृति विभाग के अनुसार यहां का किला प्रारंभिक मध्यकाल से संबंधित माना जाता है और लगभग 10 वीं–11वीं शताब्दी का है।

इन अवशेषों से उस समय की मूर्तिकला, धार्मिक मान्यताओं और मंदिर निर्माण की शैली के बारे में जानकारी मिलती है। इसी वजह से मल्हार को छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों में गिना जाता है।
मल्हार बिलासपुर में देखने लायक 10 प्रमुख स्थल
मल्हार, बिलासपुर का प्रमुख ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थल है। इसके आसपास कई धार्मिक, ऐतिहासिक और प्राकृतिक पर्यटन स्थल हैं।
- तालागांव (लगभग 18 किमी) – यहां प्रसिद्ध देवरानी-जेठानी मंदिर और अद्भुत प्राचीन मूर्तियां देखने को मिलती हैं।
- सारगांव (लगभग 20 किमी) – यहां धूमनाथ मंदिर और प्राचीन शिव स्मारक स्थित हैं।
- बिलासपुर शहर (लगभग 35 किमी) – शहर में बिलासा ताल, कानन पेंडारी और अन्य पर्यटन स्थल देखे जा सकते हैं।
- कानन पेंडारी (लगभग 35–40 किमी) – परिवार और बच्चों के साथ घूमने के लिए अच्छा जूलॉजिकल पार्क है।
- लुतरा शरीफ (लगभग 40–45 किमी) – बाबा सैयद इंसान अली शाह की प्रसिद्ध दरगाह यहां स्थित है।
- मदकू द्वीप (लगभग 40–45 किमी) – शिवनाथ नदी के बीच स्थित यह स्थान प्राचीन मंदिरों और प्राकृतिक वातावरण के लिए प्रसिद्ध है।
- रतनपुर (लगभग 45–50 किमी) – मां महामाया मंदिर के कारण प्रसिद्ध ऐतिहासिक और धार्मिक नगर है।
- रतनपुर किला (लगभग 45–50 किमी) – कलचुरी इतिहास से जुड़ा महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है।
- शिवरीनारायण (लगभग 50 किमी) – प्रसिद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल है।
- खरौद (लगभग 50–55 किमी) – प्राचीन मंदिरों और धार्मिक महत्व के लिए जाना जाता है।
ये दूरी लगभग हैं और अलग-अलग सड़क मार्ग के अनुसार थोड़ी बदल सकती हैं।
घूमने का समय
मल्हार पुरातात्विक स्मारक दिन के उजाले के दौरान खुले रहते हैं; स्थानीय संग्रहालय आमतौर पर सुबह 10:00 बजे से शाम 5:00 बजे तक संचालित होता है। यात्रा से पहले स्थानीय स्तर पर समय की पुष्टि करना बेहतर रहेगा।
प्रवेश शुल्क
मंदिरों में प्रवेश निःशुल्क है; पुरातत्व संग्रहालय में प्रवेश के लिए मामूली शुल्क (वयस्कों के लिए ₹10, बच्चों के लिए ₹5) लागू है।
यहां क्या-क्या मिला है ?
मल्हार की खुदाई में मूर्तियां, मिट्टी की आकृतियां, सिक्के, शिलालेख, भवनों के अवशेष और प्राचीन मृद्भांड मिले हैं। इन पुरावशेषों से यह समझने में मदद मिलती है कि प्राचीन समय में यहां किस प्रकार का नगर और सामाजिक जीवन विकसित हुआ था।
मल्हार कैसे पहुंचे
बिलासपुर से : मल्हार सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है। जिला प्रशासन के अनुसार बिलासपुर से मल्हार की दूरी लगभग 32 किमी है और निजी वाहन तथा नियमित बस परिवहन उपलब्ध है।
रेल से : निकटतम प्रमुख रेलवे स्टेशन बिलासपुर जंक्शन है, जो लगभग 32 किमी दूर है।
हवाई मार्ग से : रायपुर स्थित स्वामी विवेकानंद हवाई अड्डा मल्हार के सबसे नजदीक का प्रमुख हवाई अड्डा है । मल्हार रायपुर से लगभग 140 से 150 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है
किसके लिए है मल्हार खास
अगर आपको इतिहास, प्राचीन मंदिर, पुरातत्व, मूर्तिकला और छत्तीसगढ़ की संस्कृति में रुचि है, तो मल्हार आपके लिए बहुत अच्छा स्थान है। यहां घूमना केवल मंदिर देखने तक सीमित नहीं है यह प्राचीन दक्षिण कोसल की सभ्यता और कला को समझने का अवसर देता है।
मल्हार की खासियत यही है कि एक ही जगह पर आपको प्राचीन बस्ती, मंदिर, मूर्तियां, शिलालेख और अलग-अलग धार्मिक परंपराओं के प्रमाण देखने को मिलते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
मल्हार, बिलासपुर किसके लिए प्रसिद्ध है?
मल्हार प्राचीन पुरातात्विक स्थल, ऐतिहासिक मंदिरों और प्राचीन सभ्यता के अवशेषों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ पातालेश्वर मंदिर, देवरानी-जेठानी मंदिर और प्राचीन मूर्तियाँ प्रमुख आकर्षण हैं।
छत्तीसगढ़ में मल्हार किला
मल्हार में प्राचीन किले से जुड़े ऐतिहासिक अवशेष और पुरातात्विक संरचनाएँ देखने को मिलती हैं। यह क्षेत्र प्राचीन समय में महत्वपूर्ण धार्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्र रहा है।
बिलासपुर से मल्हार की दूरी
बिलासपुर शहर से मल्हार की दूरी लगभग 35–40 किलोमीटर है। सड़क मार्ग से सामान्यतः करीब 1 घंटे में मल्हार पहुँचा जा सकता है।
मल्हार क्यों प्रसिद्ध है?
मल्हार बिलासपुर का प्रसिद्ध पुरातात्विक और ऐतिहासिक स्थल है। यह विशेष रूप से पातालेश्वर महादेव मंदिर, प्राचीन मंदिरों, मूर्तियों और पुरातात्विक अवशेषों के लिए प्रसिद्ध है।
पातालेश्वर महादेव मंदिर
पातालेश्वर महादेव मंदिर मल्हार का प्रमुख प्राचीन शिव मंदिर है। यह भगवान शिव को समर्पित है और अपनी प्राचीन स्थापत्य शैली, शिवलिंग तथा ऐतिहासिक-पुरातात्विक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर परिसर में मिले अवशेष मल्हार की प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते हैं।
मल्हार बिलासपुर का इतिहास क्या है?
मल्हार छत्तीसगढ़ का एक प्राचीन पुरातात्विक स्थल है। इसका इतिहास लगभग 2000 वर्ष से भी अधिक पुराना माना जाता है। यहाँ प्राचीन मंदिरों, मूर्तियों और सभ्यता के अवशेष मिले हैं।
क्या मल्हार बिलासपुर घूमने लायक जगह है?
हाँ, मल्हार इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखने वालों के लिए घूमने लायक जगह है। यहाँ प्राचीन मंदिर, मूर्तियाँ और पुरातात्विक अवशेष देखे जा सकते हैं।
छत्तीसगढ़ में मल्हार क्या है?
मल्हार छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में स्थित एक प्राचीन पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक स्थल है।
बिलासपुर और मल्हार के बीच की दूरी कितनी है?
बिलासपुर शहर से मल्हार की दूरी लगभग 35–40 किलोमीटर है।
बिलासपुर किस बात के लिए प्रसिद्ध है?
बिलासपुर अरपा नदी, कोसा रेशम, ताला के प्राचीन मंदिर और आसपास के ऐतिहासिक एवं प्राकृतिक पर्यटन स्थलों के लिए प्रसिद्ध है।
बिलासपुर का प्रसिद्ध व्यंजन क्या है?
बिलासपुर और छत्तीसगढ़ में फरा, चीला, चौसेला, ठेठरी और खुरमी जैसे पारंपरिक व्यंजन प्रसिद्ध हैं।
बिलासपुर का शाही परिवार कौन है?
बिलासपुर के इतिहास में कलचुरी राजवंश का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। रतनपुर लंबे समय तक कलचुरी शासकों की राजधानी रहा था।
क्या बिलासपुर रहने के लिए एक अच्छी जगह है?
हाँ, बिलासपुर छत्तीसगढ़ का प्रमुख शहर है। यहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार, रेलवे और अन्य सुविधाएँ उपलब्ध हैं।
बिलासपुर में कौन-सी भाषा बोली जाती है?
बिलासपुर में मुख्य रूप से हिंदी और छत्तीसगढ़ी बोली जाती हैं।
निष्कर्ष
मल्हार छत्तीसगढ़ की प्राचीन विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहां के देवरी मंदिर, डिडनेश्वरी मंदिर, प्राचीन मूर्तियां और पुरातात्विक अवशेष इस स्थान को ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से खास बनाते हैं। अगर आप छत्तीसगढ़ के अनदेखे ऐतिहासिक स्थलों को जानना और घूमना चाहते हैं, तो मल्हार को अपनी यात्रा सूची में जरूर शामिल कर सकते हैं।
मल्हार, छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में स्थित एक अत्यंत प्राचीन और ऐतिहासिक नगरी है, जो ईसा पूर्व 1000 (मौर्य काल) से लेकर कलचुरी काल तक की समृद्ध सभ्यता का केंद्र रही है।
पुरातात्विक उत्खनन
ऐतिहासिक प्रमाण यहाँ मौर्य, सातवाहन और कलचुरी राजवंशों के सांस्कृतिक अनुक्रम और प्राचीन मिट्टी के किले (Mud Fort) के अवशेष मिले हैं।
दुर्लभ मुद्राएँ खुदाई में सातवाहन कालीन मिट्टी की सीलें और स्थानीय “मल्हार चिह्न” वाले विशेष सिक्के प्राप्त हुए हैं।
धार्मिक केंद्र यह शैव, वैष्णव, जैन और बौद्ध धर्मों का संगम था।
प्रमुख स्मारक यहाँ 11 वीं सदी का पातालेश्वर केदार मंदिर (गोमुखी शिवलिंग), डिंडेश्वरी माता मंदिर और 200 ईसा पूर्व की दुर्लभ चतुर्भुजी विष्णु प्रतिमा मुख्य आकर्षण हैं।
वर्तमान में यह स्थल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित एक राष्ट्रीय ऐतिहासिक धरोहर है।