Deepadih : Uncovering the Ancient Archaeological Marvel of Chhattisgarh

जब हम किसी पुराने मंदिर को देखते हैं तो अक्सर उसकी सुंदरता और धार्मिक महत्व पर ध्यान देते हैं लेकिन भारत में कुछ ऐसे स्थान भी मौजूद हैं जहां मंदिर केवल पूजा का केंद्र नहीं बल्कि इतिहास के जीवित प्रमाण होते हैं। छत्तीसगढ़ के सरगुजा क्षेत्र में स्थित दीपाडीह ऐसा ही एक स्थान है जिसे देखने के बाद ऐसा महसूस होता है जैसे समय अचानक कई सौ वर्ष पीछे चला गया हो।

कल्पना कीजिए कि आप घने जंगलों और ग्रामीण रास्तों से गुजरते हुए एक ऐसे क्षेत्र में पहुंचते हैं जहां चारों ओर पत्थरों से बनी प्राचीन मूर्तियां दिखाई देने लगती हैं। कुछ मंदिर खंडहर अवस्था में खड़े हैं। कुछ मूर्तियां धरती में आधी दबी हुई हैं। कहीं शिवलिंग दिखाई देता है तो कहीं देवी देवताओं की दुर्लभ प्रतिमाएं।

वातावरण में एक अजीब सी शांति होती है और ऐसा लगता है जैसे यह भूमि अपने भीतर हजारों अनकही कहानियां छिपाए बैठी हो।

Deepadih दीपाडीह का अनुभव कुछ ऐसा ही माना जाता है।

छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग में स्थित यह पुरातात्विक स्थल राज्य की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहरों में गिना जाता है। इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के अनुसार यह क्षेत्र कभी एक समृद्ध नगर और धार्मिक केंद्र रहा होगा। आज यहां बिखरे हुए मंदिरों के अवशेष मूर्तियां और स्थापत्य कला उस गौरवशाली अतीत की झलक प्रस्तुत करते हैं।

पहली बार जब कोई व्यक्ति दीपाडीह पहुंचता है तो उसे यह समझने में कुछ समय लगता है कि वह वास्तव में किसी सामान्य मंदिर परिसर में नहीं बल्कि एक विशाल पुरातात्विक क्षेत्र में खड़ा है। यहां हर पत्थर इतिहास की कहानी सुनाता हुआ प्रतीत होता है।

मुझे हमेशा ऐसे स्थान आकर्षित करते हैं जहां केवल देखने के लिए कुछ न हो बल्कि सोचने के लिए भी बहुत कुछ हो। दीपाडीह भी ऐसा ही स्थान लगता है। यहां पहुंचकर मन बार बार यह सोचता है कि आखिर सदियों पहले यहां जीवन कैसा रहा होगा। यहां रहने वाले लोग कौन थे। इन मंदिरों का निर्माण किसने कराया होगा। और फिर ऐसा क्या हुआ कि इतना समृद्ध क्षेत्र धीरे धीरे इतिहास की धूल में खो गया।

आज भी दीपाडीह के बारे में पूरे देश में उतनी चर्चा नहीं होती जितनी होनी चाहिए। यही कारण है कि यहां आने वाले लोगों को अपेक्षाकृत शांत वातावरण में इस ऐतिहासिक धरोहर को देखने का अवसर मिलता है।

अगर आप इतिहास में रुचि रखते हैं तो दीपाडीह आपको आकर्षित करेगा। अगर आपको प्राचीन मंदिरों की वास्तुकला पसंद है तो यहां देखने के लिए बहुत कुछ मिलेगा। और अगर आपको रहस्यमयी ऐतिहासिक स्थानों की खोज पसंद है तो यह जगह आपके लिए किसी खजाने से कम नहीं है।

यही कारण है कि दीपाडीह आज छत्तीसगढ़ की सबसे महत्वपूर्ण लेकिन अपेक्षाकृत कम चर्चित ऐतिहासिक धरोहरों में गिना जाता है।

दीपाडीह का इतिहास क्या है और यह स्थान इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है

किसी भी पुरातात्विक स्थल का वास्तविक महत्व उसके इतिहास में छिपा होता है और दीपाडीह इसका उत्कृष्ट उदाहरण है।

इतिहासकारों के अनुसार दीपाडीह का संबंध लगभग नौवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच के कालखंड से माना जाता है। विभिन्न पुरातात्विक अध्ययनों से संकेत मिलते हैं कि यह क्षेत्र कभी एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र रहा होगा।

Deepadih  छत्तीसगढ़ सरगुजा

यहां पाए गए मंदिरों और मूर्तियों की शैली से यह स्पष्ट होता है कि उस समय यहां कला और स्थापत्य का उच्च स्तर मौजूद था।

कई विद्वानों का मानना है कि यह क्षेत्र शैव और वैष्णव परंपराओं का महत्वपूर्ण केंद्र रहा होगा। इसके प्रमाण यहां पाए गए शिवलिंगों और विभिन्न देवी देवताओं की प्रतिमाओं से मिलते हैं।

दीपाडीह का सबसे रोचक पहलू यह है कि यहां केवल एक मंदिर नहीं बल्कि अनेक मंदिरों और धार्मिक संरचनाओं के अवशेष मिले हैं। इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि यह कभी एक बड़ा धार्मिक नगर रहा होगा।

पुरातत्व विभाग द्वारा यहां कई महत्वपूर्ण मूर्तियां और स्थापत्य अवशेष संरक्षित किए गए हैं। इनसे उस समय की कला शैली और धार्मिक मान्यताओं को समझने में सहायता मिलती है।

आज भले ही अधिकांश संरचनाएं खंडहर अवस्था में हों लेकिन उनकी भव्यता का अनुमान आज भी लगाया जा सकता है।

यही कारण है कि दीपाडीह केवल छत्तीसगढ़ का नहीं बल्कि पूरे मध्य भारत का एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल माना जाता है।

दीपाडीह तक कैसे पहुंचें और यात्रा की तैयारी कैसे करें

दीपाडीह छत्तीसगढ़ के सरगुजा क्षेत्र में स्थित है और सड़क मार्ग द्वारा यहां पहुंचा जा सकता है।

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अंबिकापुर इस क्षेत्र का प्रमुख शहर माना जाता है और अधिकांश यात्री वहीं से दीपाडीह की यात्रा करते हैं।

रेल मार्ग से आने वाले यात्री अंबिकापुर तक पहुंच सकते हैं और वहां से सड़क मार्ग द्वारा दीपाडीह जा सकते हैं।

हवाई यात्रा करने वाले यात्रियों को पहले रायपुर पहुंचना होता है और फिर सड़क या रेल मार्ग द्वारा अंबिकापुर तथा दीपाडीह तक पहुंचा जा सकता है।

क्योंकि यह एक पुरातात्विक क्षेत्र है इसलिए यहां आरामदायक जूते पहनना उपयोगी रहता है। कई स्थानों पर पैदल चलना पड़ सकता है।

गर्मियों में पानी साथ रखना आवश्यक है जबकि सर्दियों में सुबह और शाम हल्के गर्म कपड़े उपयोगी हो सकते हैं।

फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए यह स्थान बेहद आकर्षक माना जाता है क्योंकि यहां प्राचीन मूर्तियों और मंदिरों के अद्भुत दृश्य देखने को मिलते हैं।

दीपाडीह के पवित्र मंदिर और उनकी अद्भुत स्थापत्य कला

दीपाडीह की सबसे बड़ी विशेषता यहां मौजूद प्राचीन मंदिरों के अवशेष हैं। यद्यपि समय और प्राकृतिक प्रभावों के कारण कई संरचनाएं खंडहर रूप में दिखाई देती हैं लेकिन आज भी उनकी भव्यता को महसूस किया जा सकता है।

जब कोई व्यक्ति इन मंदिरों के बीच खड़ा होता है तो उसे ऐसा लगता है जैसे वह किसी खुले संग्रहालय में आ गया हो जहां हर पत्थर इतिहास का एक पन्ना बन चुका है।

शिव मंदिरों का महत्व

दीपाडीह में पाए गए अधिकांश अवशेषों से यह संकेत मिलता है कि यह क्षेत्र कभी भगवान शिव की उपासना का महत्वपूर्ण केंद्र रहा होगा।

यहां अनेक शिवलिंग और शैव परंपरा से जुड़ी मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। कई शिवलिंग आज भी स्थानीय लोगों के लिए पूजा का केंद्र बने हुए हैं।

इन मंदिरों की संरचना यह दर्शाती है कि उस समय के शिल्पकार केवल धार्मिक भावना ही नहीं बल्कि स्थापत्य विज्ञान में भी अत्यंत निपुण थे।

देवी मंदिरों के अवशेष

शिव मंदिरों के साथ साथ यहां देवी प्रतिमाएं भी प्राप्त हुई हैं।

कुछ मूर्तियों में शक्ति की उपासना के प्रमाण दिखाई देते हैं। इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि यहां शैव और शक्त परंपराएं साथ साथ विकसित हुई होंगी।

विष्णु और अन्य देवताओं की प्रतिमाएं

दीपाडीह केवल एक धार्मिक धारा तक सीमित नहीं था।

यहां विष्णु गणेश सूर्य और अन्य देवी देवताओं की मूर्तियां भी मिली हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह क्षेत्र विविध धार्मिक मान्यताओं का केंद्र रहा होगा।

मंदिरों की वास्तुकला

मंदिरों के स्तंभ द्वार और दीवारों पर की गई नक्काशी उस समय की उच्च कोटि की कला का परिचय देती है।

पत्थरों पर उकेरी गई आकृतियां केवल धार्मिक प्रतीक नहीं हैं बल्कि वे उस समय के सामाजिक जीवन और सांस्कृतिक परंपराओं को भी दर्शाती हैं।

दीपाडीह के रहस्य और पुरातात्विक महत्व

दीपाडीह को लेकर सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि इतना समृद्ध धार्मिक नगर आखिर इतिहास में कैसे खो गया।

पुरातत्वविदों का मानना है कि यहां कभी बड़ी संख्या में लोग निवास करते होंगे। मंदिरों की संख्या और संरचनाओं का विस्तार इसी ओर संकेत करता है।

Deepadih  Uncovering the Ancient Archaeological Marvel

कुछ विद्वानों का मानना है कि प्राकृतिक आपदाओं या राजनीतिक परिवर्तनों के कारण यह क्षेत्र धीरे धीरे महत्व खोता गया होगा।

आज भी यहां कई ऐसे हिस्से हैं जिनके बारे में माना जाता है कि धरती के भीतर और भी ऐतिहासिक अवशेष छिपे हो सकते हैं।

जब कोई व्यक्ति यहां घूमता है तो उसे हर जगह इतिहास की अधूरी कहानियां महसूस होती हैं।

यही रहस्य दीपाडीह को और अधिक आकर्षक बनाता है।

Dipadih (डीपाडीह ) और सामत सरना (Samat Sarna छत्तीसगढ़ के बलरामपुर-रामानुजगंज जिले (पूर्व में सरगुजा क्षेत्र) में स्थित एक अत्यंत महत्वपूर्ण और समृद्ध पुरातात्विक स्थल हैं।

शिव मंदिरों और मूर्तियों का मुख्य टीला की दूरी लगभग 2 किलोमीटर है।

यह स्थान अपनी प्राचीन शिल्पकला, ऐतिहासिक मंदिरों और जनजातीय संस्कृति के अद्भुत संगम के लिए जाना जाता है।

कलाकृति और स्थापत्य कला की विशेषताएं

  • खुला संग्रहालय (Open Museum): डीपाडीह की खुदाई से मिली मूर्तियों और अवशेषों को किसी बंद संग्रहालय के बजाय खुले मैदान (स्कल्पचर शेड) में प्रदर्शित किया गया है।
  • मंदिरों की श्रृंखला: यहाँ मंदिरों को मुख्य रूप से 5 समूहों में बांटा गया है, जिनमें सामत सरना समूह, सूर्य मंदिर समूह, रानी पोखरा समूह, उरांव टोला समूह और शाला भवन समूह शामिल हैं।
  • अद्भुत मूर्तियां: पत्थरों पर उकेरी गई शिल्पकला में भगवान शिव, विष्णु, ब्रह्मा, महिषासुरमर्दिनी, गणेश, कार्तिकेय और चामुंडा देवी की प्रतिमाएं प्रमुख हैं। इसके साथ ही यहाँ नृत्य करते मयूर और खजुराहो जैसी कामुक मूर्तियां भी देखने को मिलती हैं।
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सामत सरना Samat Sarna

सामत सरना डीपाडीह का सबसे प्रमुख पुरातात्विक और धार्मिक केंद्र है।

  • पौराणिक कथा: स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में यहाँ सामत राजा और भगवान टांगीनाथ (परशुराम का स्वरूप) के बीच भीषण युद्ध हुआ था। इस युद्ध में सामत राजा वीरगति को प्राप्त हुए थे, जिसके बाद उनकी रानियों ने एक बावड़ी में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए थे।
  • सामत राजा की पूजा: गाँव के लोग यहाँ स्थापित भगवान शिव (पशुधर) की एक नग्न प्रतिमा को ही सामत राजा मानकर पूजते थे, जिसकी वजह से इस जगह का नाम ‘सामत सरना’ पड़ा।

दीपाडीह घूमने का सबसे अच्छा समय

दीपाडीह की यात्रा के लिए अक्टूबर से मार्च तक का समय सबसे अच्छा माना जाता है।

सर्दियों में मौसम सुहावना रहता है और पुरातात्विक स्थल को आराम से देखा जा सकता है।

मानसून के बाद आसपास की हरियाली बढ़ जाती है जिससे पूरा क्षेत्र और अधिक सुंदर दिखाई देता है।

गर्मियों में तापमान अपेक्षाकृत अधिक हो सकता है इसलिए सुबह और शाम का समय भ्रमण के लिए उपयुक्त रहता है।

Deepadih दीपाडीह यात्रा का संभावित बजट

दीपाडीह की यात्रा अपेक्षाकृत कम खर्च में की जा सकती है।

यात्रा प्रकारप्रतिदिन अनुमानित खर्च
बजट यात्रा₹1000 से ₹2500
मिड रेंज यात्रा₹3000 से ₹6000
आरामदायक यात्रा₹7000 से ₹15000 या अधिक

यात्रा का खर्च परिवहन आवास और भोजन के आधार पर बदल सकता है।

स्थानीय संस्कृति और धार्मिक मान्यताएं

दीपाडीह के आसपास के गांवों में आज भी इस क्षेत्र के प्रति गहरी श्रद्धा दिखाई देती है।

स्थानीय लोग इन प्राचीन मंदिरों को केवल ऐतिहासिक धरोहर नहीं बल्कि पवित्र स्थल भी मानते हैं।

कई धार्मिक अवसरों पर श्रद्धालु यहां पूजा अर्चना करने आते हैं।

यहां की संस्कृति में इतिहास और आस्था दोनों का अनूठा मिश्रण दिखाई देता है।

सात दिन की विस्तृत यात्रा योजना

पहला दिन यात्रा और विश्राम के लिए रखें।

दूसरा दिन प्रमुख मंदिर समूहों के भ्रमण के लिए रखें।

तीसरा दिन मूर्तिकला और स्थापत्य कला को समझने में बिताएं।

चौथा दिन फोटोग्राफी और अध्ययन के लिए रखें।

पांचवां दिन स्थानीय संस्कृति और ग्रामीण जीवन को जानने में बिताएं।

छठा दिन पुनः पुरातात्विक क्षेत्र का गहराई से अवलोकन करें।

सातवां दिन अनुभवों को समेटते हुए वापसी करें।

जिम्मेदार विरासत पर्यटन

ऐतिहासिक धरोहरों को नुकसान न पहुंचाएं।

मूर्तियों और संरचनाओं पर कुछ भी न लिखें।

कचरा न फैलाएं।

स्थानीय लोगों और धार्मिक भावनाओं का सम्मान करें।

पुरातात्विक स्थलों की पवित्रता बनाए रखना हर यात्री की जिम्मेदारी है।

सुरक्षा और उपयोगी सुझाव

आरामदायक जूते पहनें।

पर्याप्त पानी साथ रखें।

पुरानी संरचनाओं पर चढ़ने का प्रयास न करें।

धूप से बचाव के लिए टोपी और छाता साथ रखें।

फोटोग्राफी करते समय संरचनाओं को नुकसान न पहुंचाएं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. दीपाडीह को छत्तीसगढ़ का महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल क्यों माना जाता है

दीपाडीह में बड़ी संख्या में प्राचीन मंदिरों मूर्तियों और स्थापत्य अवशेषों की खोज हुई है जो इसे राज्य की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल करते हैं। यहां का इतिहास मध्यकालीन धार्मिक और सांस्कृतिक विकास की झलक प्रस्तुत करता है।

2. दीपाडीह का इतिहास कितने पुराने समय से जुड़ा माना जाता है

इतिहासकारों के अनुसार यहां के अधिकांश अवशेष नौवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच के माने जाते हैं हालांकि कुछ शोधकर्ता इससे भी अधिक प्राचीन गतिविधियों की संभावना व्यक्त करते हैं।

3. क्या यहां आज भी पूजा की जाती है

हां कुछ शिवलिंग और धार्मिक अवशेष आज भी स्थानीय श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बने हुए हैं।

4. क्या दीपाडीह केवल इतिहास प्रेमियों के लिए है

नहीं। यह स्थान इतिहास प्रेमियों के साथ साथ धार्मिक यात्रियों फोटोग्राफरों और संस्कृति में रुचि रखने वाले लोगों को भी आकर्षित करता है।

5. क्या यहां परिवार के साथ घूमना उचित है

हां। परिवार के साथ यहां आकर इतिहास और संस्कृति दोनों को समझा जा सकता है।

6. क्या यहां फोटोग्राफी की जा सकती है

यह स्थान फोटोग्राफी के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जाता है क्योंकि यहां अनेक प्राचीन मूर्तियां और संरचनाएं मौजूद हैं।

7. क्या यहां किसी गाइड की आवश्यकता होती है

यदि कोई व्यक्ति इतिहास को गहराई से समझना चाहता है तो स्थानीय गाइड उपयोगी साबित हो सकता है।

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8. क्या यहां पूरे वर्ष पर्यटक आते हैं

हां लेकिन सर्दियों और मानसून के बाद का समय सबसे अधिक उपयुक्त माना जाता है।

9. दीपाडीह में सबसे अधिक कौन से मंदिर अवशेष पाए गए हैं

यहां शैव परंपरा से जुड़े मंदिर और शिवलिंग सबसे अधिक चर्चा में रहते हैं।

10. क्या यहां देवी देवताओं की मूर्तियां भी मिली हैं

हां। शिव के अलावा विष्णु गणेश देवी और अन्य धार्मिक प्रतिमाएं भी प्राप्त हुई हैं।

11. डीपाडीह का ऐतिहासिक महत्व क्या है?

यहाँ ८वीं से १४वीं शताब्दी ( 8th to 14th century ) के शैव और शाक्य संप्रदाय के मंदिर और अवशेष मिलते हैं। यह स्थान राजा सामंत के प्राचीन काल का माना जाता है।

12. डीपाडीह किस जिले में स्थित है?

डीपाडीह छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में स्थित है

13. क्या यहां शोध कार्य किए जाते हैं

पुरातत्व और इतिहास के क्षेत्र में रुचि रखने वाले शोधकर्ताओं के लिए यह महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है।

14. क्या यहां की मूर्तिकला विशेष मानी जाती है

हां। यहां की मूर्तियां उस समय की उच्च स्तरीय कला और शिल्प कौशल का प्रमाण मानी जाती हैं।

15. क्या यहां कोई रहस्य भी जुड़े हुए हैं

दीपाडीह का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि इतना समृद्ध धार्मिक नगर समय के साथ कैसे विलुप्त हो गया।

16. सामत सरना कहां स्थित है?

समत सरना दीपाडीह में स्थित एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है, जो अपने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। दीपाडीह भारत के छत्तीसगढ़ राज्य में स्थित है, जो अपनी समृद्ध आदिवासी संस्कृति, प्राचीन मंदिरों और प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है

17. क्या यहां एक दिन में पूरा भ्रमण किया जा सकता है

मुख्य स्थल देखे जा सकते हैं लेकिन गहराई से समझने के लिए अधिक समय देना बेहतर माना जाता है।

18. क्या दीपाडीह छत्तीसगढ़ के छिपे हुए पर्यटन स्थलों में गिना जाता है

हां। राज्य के बाहर अभी भी बहुत कम लोग इसके बारे में जानते हैं।

19. क्या यहां प्रकृति का आनंद भी लिया जा सकता है

हां। आसपास का शांत वातावरण और हरियाली यात्रा को और अधिक सुखद बनाती है।

20. क्या दीपाडीह की यात्रा लंबे समय तक याद रह सकती है

जो लोग इतिहास और रहस्यों में रुचि रखते हैं उनके लिए यह यात्रा लंबे समय तक याद रहने वाली बन सकती है।

निष्कर्ष

दीपाडीह केवल एक पुरातात्विक स्थल नहीं है बल्कि वह एक ऐसा स्थान है जहां इतिहास आज भी सांस लेता हुआ महसूस होता है। यहां के मंदिरों के अवशेष हमें उस समय की याद दिलाते हैं जब यह क्षेत्र धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा होगा।

आज भले ही यहां की अधिकांश संरचनाएं खंडहर रूप में दिखाई देती हों लेकिन उनकी भव्यता और कलात्मकता अब भी लोगों को प्रभावित करती है। यहां घूमते समय बार बार यह एहसास होता है कि भारत की धरती में अभी भी कितनी अनगिनत कहानियां छिपी हुई हैं।

यदि आप छत्तीसगढ़ के इतिहास को गहराई से समझना चाहते हैं तो दीपाडीह उन स्थानों में से एक है जिसे अवश्य देखना चाहिए। यह केवल एक यात्रा नहीं बल्कि अतीत की ओर लौटने जैसा अनुभव है।

मेरा अनुभव

अगर मुझे दीपाडीह के बारे में अपनी भावना व्यक्त करनी हो तो मैं कहूंगा कि यह उन स्थानों में से एक है जहां पहुंचकर मन में श्रद्धा से अधिक जिज्ञासा पैदा होती है।

मैं कल्पना करता हूं कि सुबह का समय है। हल्की धूप प्राचीन मंदिरों के टूटे हुए स्तंभों पर पड़ रही है। चारों ओर शांति है। कहीं कोई भीड़ नहीं है। केवल हवा की आवाज और पक्षियों का स्वर सुनाई दे रहा है।

मैं धीरे धीरे उन प्राचीन मूर्तियों के बीच चल रहा हूं और हर मूर्ति को देखकर यही सोच रहा हूं कि इसे बनाने वाले शिल्पकार ने कितनी मेहनत और कितनी श्रद्धा के साथ इसे तराशा होगा। सदियों पहले यहां कितने लोग आते होंगे। कितनी पूजा होती होगी। कितने उत्सव मनाए जाते होंगे।

दीपाडीह जैसे स्थान मुझे हमेशा यह एहसास कराते हैं कि इतिहास केवल किताबों में नहीं होता। इतिहास पत्थरों में भी जीवित रहता है। बस उसे देखने और समझने की दृष्टि होनी चाहिए।

यही कारण है कि मेरे लिए दीपाडीह केवल एक पर्यटन स्थल नहीं बल्कि समय की गहराइयों में छिपी हुई एक ऐसी कहानी है जिसे जितना पढ़ो उतना कम लगता है।