Bastar Dussehra 2026: Date, Rath Yatra, History & Festival Guide

छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में मनाया जाने वाला बस्तर दशहरा अपनी अनोखी परंपराओं और जनजातीय संस्कृति के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यह बस्तर का सबसे प्रमुख त्योहार है, जिसमें आज भी राजपरिवार की परंपराओं और स्थानीय जनजातियों की महत्वपूर्ण भूमिका देखने को मिलती है।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि यहां दशहरे पर रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। इसके बजाय पूरा उत्सव मां दंतेश्वरी की आराधना और उनसे जुड़ी पारंपरिक रस्मों को समर्पित होता है। मां दंतेश्वरी के स्वागत से लेकर विदाई तक कई धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं।

लगभग 600 साल पुरानी यह परंपरा बस्तर के काकतीय शासकों द्वारा विकसित की गई थी और इसमें आदिवासी मान्यताओं और हिंदू प्रथाओं का मिश्रण देखने को मिलता है।

बस्तर दशहरा की सबसे खास बात यह है कि यह लगभग 75 दिनों तक चलने वाला अनोखा उत्सव है। इस दौरान रथ निर्माण, रथ परिक्रमा और जनजातीय रीति-रिवाज निभाए जाते हैं। उत्सव के अंतिम चरण में रथ चोरी की अनूठी परंपरा भी निभाई जाती है, जो इस दशहरे को देश के दूसरे दशहरा उत्सवों से अलग पहचान देती है।

छत्तीसगढ़ के जगदलपुर और पूरे बस्तर क्षेत्र (Bastar Dussehra) में मनाया जाने वाला एक आदिवासी-हिंदू त्योहार है, जिसे लगभग 75 दिनों तक चलने के कारण दुनिया का सबसे लंबा त्योहार माना जाता है। इसका राम-रावण कथा से कोई संबंध नहीं है, जो भारत के अन्य हिस्सों में दशहरा की पहचान है।

इसके बजाय, यह बस्तर की संरक्षक देवी दंतेश्वरी देवी पर केंद्रित है और कई हफ्तों तक चलने वाली पूजा के लिए दर्जनों ग्राम और वन देवी-देवताओं को एकत्रित किया जाता है।

देश के सबसे अनोखे त्योहारों में से एक है. करीब 75 दिनों तक चलने वाला यह उत्सव जनजातीय संस्कृति, धार्मिक आस्था और सदियों पुरानी परंपराओं की पहचान है.

बस्तर दशहरा 2026: तारीख, रथ यात्रा, इतिहास और मेले की पूरी जानकारी

छत्तीसगढ़ का विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा दुनिया का सबसे लंबा चलने वाला त्योहार है, जो पूरे 75 दिनों तक मनाया जाता है। भारत के अन्य हिस्सों के विपरीत, यहाँ दशहरे पर रावण का पुतला नहीं जलाया जाता और न ही यह श्री राम की विजय से जुड़ा है। इसके बजाय, यह पर्व बस्तर की अधिष्ठात्री देवी, माँ दंतेश्वरी और स्थानीय जनजातीय संस्कृति व आस्था को समर्पित है।

दशहरे के अंतिम दिनों में परंपरा के अनुसार, आदिवासी इस रथ को ‘चुराकर’ शहर से दूर कुमड़ाकोट ले जाते हैं। अगले दिन राजा और पूरा प्रजा वहाँ जाकर आदिवासियों को मनाते है, जिसके बाद रथ को वापस सम्मान के साथ लाया जाता है।

दशहरे के दौरान पूरा जगदलपुर शहर एक विशाल जीवंत मेले में बदल जाता है। बस्तर के घने जंगलों और अंदरूनी गांवों से हजारों आदिवासी पारंपरिक वेशभूषा में अपने स्थानीय देवी-देवताओं के प्रतीकों (आंगा देव और डोलियों) को कंधों पर उठाकर यहाँ पहुँचते हैं

बस्तर का दशहरा कब है ?

बस्तर दशहरा की शुरुआत हर साल श्रावण मास की अमावस्या (हरियाली अमावस्या) से होती है और इसका समापन विजयदशमी के साथ होता है। हिंदू चंद्र पंचांग के अनुसार होने के कारण, इसकी शुरुआत और समाप्ति दोनों में हर साल कुछ हफ्तों का अंतर होता है।

बस्तर दशहरा 2026 की शुरुआत 12 अगस्त 2026 (पाट जात्रा के साथ) हो चुकी है और यह लगभग 75 दिनों तक चलकर 27 अक्टूबर 2026 को संपन्न होगा।

बस्तर दशहरा की मुख्य जानकारी और तिथियां:

अवधि: लगभग 75 दिन (दुनिया के सबसे लंबे त्योहारों में से एक)।

स्थान: जगदलपुर, बस्तर जिला, छत्तीसगढ़ (माँ दंतेश्वरी मंदिर के पास)

बस्तर दशहरा का इतिहास

बस्तर दशहरा का इतिहास लगभग 600 वर्ष पुराना है, जिसकी शुरुआत 15वीं शताब्दी (लगभग 1408 ईस्वी) में बस्तर के काकतीय वंश के चौथे शासक राजा पुरुषोत्तम देव के शासनकाल के दौरान हुई थी।”

बस्तर दशहरा छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र का विश्व प्रसिद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव है। लगभग 75 दिनों तक चलने वाला यह उत्सव भारत में मनाए जाने वाले अन्य दशहरा उत्सवों से अपने स्वरूप में पूर्णतः भिन्न है।

इसका मुख्य केंद्र भगवान राम और रावण की कथा नहीं, बल्कि माँ दंतेश्वरी की पूजा, स्थानीय देवी-देवताओं, आदिवासी परंपराओं और बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है।

बस्तर दशहरा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। इसके बजाय, यह त्योहार अनेक धार्मिक अनुष्ठानों, देवी-देवताओं के आगमन, पारंपरिक रथयात्राओं, लोक परंपराओं और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से मनाया जाता है।

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बस्तर दशहरा दूसरे दशहरे से अलग क्यों है?

बस्तर दशहरा केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की जनजातीय संस्कृति और सामूहिक पहचान का प्रतीक है. इसकी परंपराएं स्थानीय समुदायों को अपनी ऐतिहासिक विरासत से जोड़ती हैं. मां दंतेश्वरी की आराधना, पारंपरिक रथ यात्रा और अलग-अलग रस्में इस पर्व को देश के दूसरे दशहरा आयोजनों से अलग बनाती हैं.

  • रावण दहन नहीं होता: यहाँ पर रावण का पुतला नहीं जलाया जाता है, बल्कि यह पूरा पर्व माँ दंतेश्वरी और स्थानीय देवी-देवताओं की आराधना को समर्पित है।
  • विशाल रथ: साल की लकड़ी से बना हुआ भव्य और विशाल दो मंजिला रथ खींचा जाता है, जिसमें माँ दंतेश्वरी की डोली रखकर नगर भ्रमण कराया जाता है।
  • काछन गादी परंपरा: पनका समुदाय की एक कुमारी कन्या बेल के कांटों से बने झूले पर बैठकर राजा को बस्तर दशहरा की अनुमति और आशीर्वाद देती है।

बस्तर दशहरा की रथ यात्रा

बस्तर दशहरा की रथ यात्रा विश्व प्रसिद्ध है क्योंकि यहाँ पूरे भारत से अलग, रावण का दहन नहीं किया जाता, बल्कि लगभग 75 दिनों तक माँ दंतेश्वरी की आराधना और विशाल लकड़ी के रथों की भव्य परिक्रमा की जाती है।

यह 600 साल से भी अधिक पुरानी परंपरा है, जिसकी शुरुआत 15वीं शताब्दी (लगभग 1408 ईस्वी) में काकतीय वंश के चौथे शासक राजा पुरुषोत्तम देव ने की थी। जगन्नाथ पुरी के राजा ने उन्हें ‘रथपति’ की उपाधि दी। और 16 पहियों का एक विशाल रथ भेंट किया था।

बस्तर के भूगोल के कारण उस विशाल रथ को टुकड़ों में बांटा गया और वहीं से बस्तर दशहरा में अलग-अलग रथों की यात्रा का जन्म हुआ।

बस्तर दशहरा की रथ यात्रा की पूरी जानकारी विस्तार से नीचे दी गई है :-

रथों का अनोखा निर्माण और कारीगरी

बिना कीलों का निर्माण: इन भारी-भरकम रथों को बनाने में एक भी लोहे की कील का उपयोग नहीं किया जाता। इन्हें पूरी तरह साल और तिनसा की लकड़ी से पारंपरिक औजारों, लकड़ी के खूंटों और जूट की रस्सियों के सहारे तैयार किया जाता है।

विशेष जनजातीय भागीदारी: रथ निर्माण का कार्य झाड़ उमरगांव और बेड़ा उमरगांव के विशेष सांवरा समुदाय के कारीगर पीढ़ियों से करते आ रहे हैं।

लकड़ी की पूजा (पाटा जात्रा): रथ निर्माण के लिए सावन महीने में हरीली अमावस्या के दिन पहली लकड़ी (साल के तने) की पूजा की जाती है, जिसे ‘पाटा जात्रा’ रस्म कहते हैं

रथ चुराने की अनोखी रस्म: ‘भीतर रैनी’ और ‘बाहर रैनी’

रथ यात्रा का सबसे रोमांचक मोड़ विजयदशमी की रात को आता है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘भीतर रैनी’ कहते हैं:

रथ की “चोरी”: स्थापित परंपरा के अनुसार, रात के समय किलेपाल क्षेत्र के आदिवासी चोरी-छिपे इस 8 पहियों वाले विशाल रथ को ‘चुराकर’ शहर से दूर कुम्हड़ाकोट के जंगलों में ले जाते हैं।

बाहर रैनी (Bahar Raini): अगले दिन (एकादशी को), बस्तर के राजा और नगरवासी गाजे-बाजे के साथ कुम्हड़ाकोट जाते हैं। वहां आदिवासियों को मनाकर, उनके साथ नए अन्न का भोग (नवाखाई) ग्रहण करते हैं। इसके बाद उसी रथ पर माँ दंतेश्वरी के छत्र को ससम्मान वापस जगदलपुर लाया जाता है, जिसे ‘बाहर रैनी’ की भव्य सवारी कहा जाता है।

सामाजिक समरसता का प्रतीक

यह रथ यात्रा सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि बस्तर की सभी जनजातियों (मुरिया, माड़िया, हल्बा, धुरवा, भतरा) और राजपरिवार की एकजुटता का अद्भुत उदाहरण है। रथ को तैयार करने से लेकर, रस्सियों को बुनने और उसे खींचने तक का हर एक काम अलग-अलग गांवों और समाजों के लिए सदियों से तय है, जिसे वे आज भी पूरी निष्ठा से निभाते हैं।

बस्तर दशहरा की प्रमुख रस्में और परंपराएं

बस्तर दशहरा छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में मनाया जाने वाला दुनिया का सबसे लंबा, करीब 75 दिनों तक चलने वाला अनोखा पर्व है। इस पर्व में रावण का वध नहीं होता है, बल्कि यहाँ की आराध्य देवी माँ दंतेश्वरी और क्षेत्रीय देवी-देवताओं की आराधना की जाती है।

  • पाट जात्रा
  • डेरी गड़ाई
  • काछनगादी
  • जोगी बिठाई
  • रथ परिक्रमा
  • निशा जात्रा
  • मावली परघाव
  • भीतर रैनी और बाहर रैनी
  • मुरिया दरबार

इस संपूर्ण 75 दिवसीय आयोजन का मुख्य कार्यक्रम और प्रमुख तिथियाँ इस प्रकार हैं :-

पाट जात्रा (12 अगस्त): इस पूजा विधान के साथ बस्तर दशहरा की औपचारिक शुरुआत होती है।

डेरी गड़ाई (23 सितंबर): सिरहासार भवन में यह विशेष रस्म श्रद्धा के साथ संपन्न होती है।

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काछनगादी (10 अक्टूबर): इस रस्म में कुमारी कन्या कांटे के झूले पर बैठकर राजा और बस्तरवासियों को दशहरा संपन्न कराने की अनुमति देती हैं।

जोगी बिठाई (11-12 अक्टूबर): सीरासार भवन में एक जोगी 9 दिनों की कठोर तपस्या और उपवास के लिए गड्ढे में बैठते हैं।

रथ परिक्रमा (13 से 18 अक्टूबर): इस दौरान लकड़ी से बने विशाल पारंपरिक फूलों के रथ को जगदलपुर शहर में खींचा जाता है।

निशा जात्रा (18 अक्टूबर): अष्टमी की रात को होने वाला विशेष निशा पूजा व अनुष्ठान।

मावली परघाव (19-20 अक्टूबर): माँ मौली देवी की डोली का भव्य स्वागत व नगर आगमन होता है।

भीतर रैनी (20 अक्टूबर): विजय दशमी के अवसर पर रथ परिक्रमा का मुख्य विधान होता है।

बाहर रैनी (21 अक्टूबर): रथ को कुम्हड़ाकोट की ओर खींचकर ले जाया जाता है।

मुरिया दरबार (22 अक्टूबर): महाराज और आदिवासी मुखियाओं का ऐतिहासिक पारंपरिक दरबार लगता है।

कुटुंब जात्रा और ओहाड़ी विदाई (24 से 27 अक्टूबर): देवी-देवताओं और मां दंतेश्वरी की डोली की विदाई के साथ 75 दिनों के इस मेले का समापन होता है।

बस्तर दशहरा मेला कहां लगता है?

बस्तर दशहरा मेला छत्तीसगढ़ के जगदलपुर (बस्तर जिला) शहर में लगता है, विशेष रूप से दंतेश्वरी मंदिर और सिरासार चौक के आसपास के क्षेत्रों में इसका मुख्य आयोजन होता है।

बस्तर दशहरा 2026 की शुरुआत 12 अगस्त 2026 (पाट जात्रा के साथ) हो चुकी है और यह लगभग 75 दिनों तक चलकर 27 अक्टूबर 2026 को संपन्न होगा।

बस्तर दशहरा की मुख्य जानकारी और तिथियां

  • अवधि: लगभग 75 दिन (दुनिया के सबसे लंबे त्योहारों में से एक)।
  • स्थान: जगदलपुर, बस्तर जिला, छत्तीसगढ़ (माँ दंतेश्वरी मंदिर के पास)

विशेषता : यहाँ रावण दहन नहीं किया जाता है; यह पूरा पर्व माँ दंतेश्वरी और क्षेत्रीय देवी-देवताओं की आराधना को समर्पित होता है। इसमें लकड़ी से बने विशाल रथ (फूल रथ और विजय रथ) की परिक्रमा मुख्य आकर्षण होती है।

बस्तर दशहरा 2026 में जगदलपुर कैसे पहुंचें और कहां ठहरें ?

जगदलपुर कैसे पहुंचें
जगदलपुर बस्तर की सांस्कृतिक और प्रशासनिक राजधानी है और यह महोत्सव का आधार भी है। छत्तीसगढ़ के जगदलपुर (बस्तर) पहुंचने के लिए सड़क, रेल और वायुमार्ग के माध्यम से आसानी से यात्रा की जा सकती है

हवाई मार्ग से: जगदलपुर में अपना स्वयं का हवाई अड्डा मां दंतेश्वरी हवाई अड्डा (Maa Danteshwari Airport / JGB) है। यह शहर के केंद्र से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।,

स्वामी विवेकानंद अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, रायपुर (Raipur Airport) पहुंच सकते हैं। रायपुर हवाई अड्डा जगदलपुर से लगभग 291–300 किलोमीटर दूर है, जहाँ से टैक्सी या बस द्वारा जगदलपुर पहुंचा जा सकता है।

ट्रेन द्वारा: जगदलपुर का अपना रेलवे स्टेशन है, जहाँ से विशाखापत्तनम, रायपुर और भुवनेश्वर के लिए ट्रेनें चलती हैं।

सड़क मार्ग से: रायपुर – जगदलपुर की सड़क यात्रा मध्य भारत की सबसे कम चर्चित सड़क यात्राओं में से एक है, जो घने जंगलों से घिरे घाटों और आदिवासी गांवों से होकर गुजरती है। अधिकांश सांस्कृतिक यात्री इसी मार्ग को चुनते हैं क्योंकि यात्रा ही उनके अनुभव का एक अभिन्न अंग है।

कहां ठहरें के लिए रायपुर को अपना मुख्य स्थान बना सकते है

जगदलपुर में होटलों की संख्या सीमित है और दशहरा के दौरान महीनों पहले ही बुकिंग हो जाती है। अधिकांश यात्रियों के लिए रायपुर को अपना मुख्य स्थान बनाना बेहतर विकल्प है — यहाँ बेहतर होटल विकल्प, अधिक विश्वसनीय परिवहन और बस्तर तक आसान ड्राइव की सुविधा उपलब्ध है।

रायपुर, दुर्ग और नागपुर में कपल्स के लिए उपयुक्त होटल उत्तर और पश्चिम से बस्तर आने वाले यात्रियों के लिए सुविधाजनक स्थान पर स्थित हैं। यदि आप अक्टूबर 2026 के व्यस्त समय में यात्रा कर रहे हैं, तो कम से कम 1 – 2 महीने पहले बुकिंग करें। त्योहारों के मौसम में बस्तर में होटल की मांग तेजी से बढ़ जाती है।

बस्तर दशहरा के आसपास घूमने की जगहें

1. चित्रकोट जलप्रपात (Chitrakote Waterfalls)

  • इसे “भारत का नियाग्रा फॉल्स” कहा जाता है। इंद्रावती नदी पर बना यह जलप्रपात भारत का सबसे चौड़ा झरना है। दशहरा (अक्टूबर) के समय मानसून के ठीक बाद इसका रूप बेहद विशाल और गर्जना से भरा होता है, जिसे देखना एक जादुई अनुभव है।

2. तीरथगढ़ जलप्रपात (Tirathgarh Waterfalls)

  • कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान में स्थित यह एक बेहद खूबसूरत सीढ़ीदार जलप्रपात है। यहाँ पानी लगभग 300 फीट की ऊँचाई से नीचे गिरता है, जिससे ऐसा लगता है मानो दूध की धारा बह रही हो। शांत वातावरण और हरी-भरी वादियों के कारण यह पिकनिक के लिए बेस्ट है।
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3. कुटुंबसर गुफाएं (Kotumsar Caves)

  • यह भारत की सबसे गहरी और रहस्यमयी प्राकृतिक चूना पत्थर की गुफाएं हैं। कांगेर घाटी पार्क के घने जंगलों के नीचे स्थित इस गुफा में आपको स्टैलेक्टाइट्स और स्टैलेग्माइट्स की अद्भुत कलाकृतियां देखने को मिलेंगी। यहाँ पाई जाने वाली अंधी मछलियां पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केंद्र हैं।

4. दंतेश्वरी मंदिर, दंतेवाड़ा (Danteshwari Temple)

  • बस्तर दशहरा का धार्मिक केंद्र यही शक्तिपीठ है, जो 52 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। बस्तर दशहरा के दौरान यहाँ से माता माई जी की डोली को जगदलपुर लाया जाता है, जो उत्सव की मुख्य रस्मों में से एक है। इतिहास और बस्तर की संस्कृति को समझने के लिए यहाँ जाना सबसे जरूरी है।

5. कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान (Kanger Ghati National Park)

  • प्रकृति प्रेमियों और एडवेंचर के शौकीनों के लिए यह स्वर्ग जैसा है। यह पार्क घने जंगलों, जैव विविधता, खूबसूरत पहाड़ियों और वन्यजीवों (जैसे बस्तर की प्रसिद्ध पहाड़ी मैना) से समृद्ध है। यहाँ आप ट्रेकिंग और सफारी का आनंद ले सकते हैं।

6. बस्तर पैलेस और दलपत सागर (Bastar Palace & Dalpat Sagar)

  • जगदलपुर शहर के भीतर स्थित बस्तर पैलेस ऐतिहासिक चालुक्य (काकतीय) राजवंश का महल है, जो दशहरा की कई पारंपरिक रस्मों का गवाह बनता है। इसके ठीक पास दलपत सागर स्थित है, जो छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी कृत्रिम झीलों में से एक है, जहाँ आप शाम को बोटिंग और सनसेट का आनंद ले सकते हैं।
बस्तर दशहरा से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. बस्तर का मेला कब लगता है?

बस्तर दशहरा के दौरान जगदलपुर में अलग-अलग दिनों पर धार्मिक आयोजन और मेले जैसी रौनक देखने को मिलती है

2. बस्तर की वर्त्तमान राजा कौन थी?

बस्तर के वर्तमान राजा महाराजा कमल चंद्र भंज देव हैं। बस्तर के 22वें राजा हैं (1996 से वर्तमान तक)

3. बस्तर का प्राचीन नाम क्या था?

बस्तर का प्राचीन नाम दंडकारण्य था। छत्तीसगढ़ का प्राचीन नाम दक्षिण कौशल के नाम से भी जाना जाता था।

4. बस्तर दशहरा की रथ यात्रा क्यों प्रसिद्ध है?

इसकी रथ यात्रा पारंपरिक लकड़ी के रथ और स्थानीय आदिवासी समुदायों की भागीदारी के लिए प्रसिद्ध है। यह उत्सव की प्रमुख आकर्षणों में से एक है।

5. बस्तर दशहरा में रावण दहन क्यों नहीं होता ?

बस्तर दशहरा में रावण दहन की परंपरा नहीं है। यहां यह उत्सव भगवान राम की रावण पर विजय के बजाय मां दंतेश्वरी की पूजा और स्थानीय आदिवासी परंपराओं से जुड़ा हुआ है।

6. बस्तर दशहरा कितने दिनों तक चलता है ?

बस्तर दशहरा लगभग 75 दिनों तक चलने वाला पारंपरिक उत्सव है। इसमें अलग-अलग धार्मिक रस्में और सांस्कृतिक आयोजन होते हैं। जनजातीय रीति-रिवाजों के साथ पुरे उत्सव को मनाया जाता है

निष्कर्ष

बस्तर दशहरा छत्तीसगढ़ की पहचान और यहां की समृद्ध संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह त्योहार अपनी अनोखी परंपराओं, जनजातीय रीति-रिवाजों और मां दंतेश्वरी के प्रति लोगों की अटूट आस्था के लिए जाना जाता है।

जहां देश के दूसरे हिस्सों में दशहरे पर रावण का पुतला जलाया जाता है, वहीं बस्तर में मां दंतेश्वरी की पूजा और उनसे जुड़ी पारंपरिक रस्मों के साथ यह उत्सव मनाया जाता है। यही विशेषता इसे दूसरे दशहरा उत्सवों से अलग बनाती है।

लगभग 75 दिनों तक चलने वाला यह उत्सव केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि बस्तर के इतिहास, राजपरिवार की परंपराओं और जनजातीय समाज की एकता को भी दर्शाता है। रथ निर्माण से लेकर रथ परिक्रमा और रथ चोरी जैसी रस्में इस त्योहार को और भी खास बनाती हैं।

पीढ़ियों से चली आ रही इन परंपराओं को आज भी पूरे उत्साह के साथ निभाया जाता है, जो बस्तर की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखती हैं।

अगर आप छत्तीसगढ़ की संस्कृति, प्राचीन परंपराओं और जनजातीय जीवन को करीब से जानना चाहते हैं, तो बस्तर दशहरा आपके लिए खास और अनोखा यात्रा अनुभव बन सकता है।

यहां की धार्मिक मान्यताएं, पारंपरिक आयोजन और लोगों की भागीदारी आपको एक अलग अनुभव देते हैं। यही वजह है कि बस्तर दशहरा सिर्फ छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश में अपनी अलग पहचान रखता है।